Friday, February 13, 2026

सरताज

खामोश तुम हो
बेआवाज हूं मैं
बेचैन बदहवास 
परवाज हूं मैं

तुम्हारे ही चर्चे 
जमाने भर में हैं 
हिजरत-ए-वफा 
गमनवाज हूं मैं

बेदखल आंखे
बरसती रही 
फिरभी नाकारा 
बेअंदाज हूं मैं 

यूं तो हुए हैं 
दिवाने कई
सर-ए-आशिक
सरताज हूं मैं 

- संदीप भानुदास चांदणे (शुक्रवार, १३/२/२०२६)

Thursday, February 12, 2026

दुनिया

हैं दुनिया कहते जो हैं इसका नाम
नहीं मुझे उस जगह से कोई काम 
हैं दुनिया जहाँ पर हैं इन्सान रहते 
इन्सानियत हैं लेकिन जहाँ बदनाम

ये दुनिया बनी दुनियावालो के दम पर
हैं दुनिया यही जो थी बरसो यही पर
ये दुनिया वाले मगर आते जाते रहेंगे
दुनिया जैसी की तैसी रहेगी यही पर

समझते हैं जो देखी दुनिया हैं हमने
गली गली उन्हे भटकते देखा हैं हमने 
जो नाजो से परदेस जाके भी आये
उन्हे दुनिया से मुंह मोडते देखा हैं हमने

हैं दुनिया ये जैसी नहीं भाती किसीको
हैं अपनी पसंद अलग दुनिया सभीको
आये तो हैं अब ये समझना पडेगा 
हैं दुनिया मगर जिसमें जीना हैं सभीको 

- संदीप भानुदास चांदणे (गुरुवार, १२/२/२०२६)


सरताज

खामोश तुम हो बेआवाज हूं मैं बेचैन बदहवास  परवाज हूं मैं तुम्हारे ही चर्चे  जमाने भर में हैं  हिजरत-ए-वफा  गमनवाज हूं मैं बेदखल आंखे बरसती रह...