हैं दुनिया कहते जो हैं इसका नाम
नहीं मुझे उस जगह से कोई काम
हैं दुनिया जहाँ पर हैं इन्सान रहते
इन्सानियत हैं लेकिन जहाँ बदनाम
ये दुनिया बनी दुनियावालो के दम पर
हैं दुनिया यही जो थी बरसो यही पर
ये दुनिया वाले मगर आते जाते रहेंगे
दुनिया जैसी की तैसी रहेगी यही पर
समझते हैं जो देखी दुनिया हैं हमने
गली गली उन्हे भटकते देखा हैं हमने
जो नाजो से परदेस जाके भी आये
उन्हे दुनिया से मुंह मोडते देखा हैं हमने
हैं दुनिया ये जैसी नहीं भाती किसीको
हैं अपनी पसंद अलग दुनिया सभीको
आये तो हैं अब ये समझना पडेगा
हैं दुनिया मगर जिसमें जीना हैं सभीको
- संदीप भानुदास चांदणे (गुरुवार, १२/२/२०२६)