काफीर हूं इसीलिए दुआमें हाथ नहीं उठाये जाते
- संदीप भानुदास चांदणे (गुरूवार , १७/१०/२०२४)
मधुर शीळ मी वार्याची, पावसाची मी सन्ततधार, सडा पाडतो गीतांचा, मी शब्दांचा जादूगार....
ये रात आयेगी फुलो के साथ महकी हुई बहकी हुई सोचा न था ये रात आयेगी आई है जैसे मलमलके आंचलसे लिपटी बहारोसे खुशबू की महकी हवाये हो गाती हुई मिठ...