बेआवाज हूं मैं
बेचैन बदहवास
परवाज हूं मैं
तुम्हारे ही चर्चे
जमाने भर में हैं
हिजरत-ए-वफा
गमनवाज हूं मैं
बेदखल आंखे
बरसती रही
फिरभी नाकारा
बेअंदाज हूं मैं
यूं तो हुए हैं
दिवाने कई
सर-ए-आशिक
सरताज हूं मैं
- संदीप भानुदास चांदणे (शुक्रवार, १३/२/२०२६)
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