Friday, April 3, 2026

बदहाल ओ बेचारा दिल

मलमलो-सुर्ख दामन शब-ए-हयात हमनींद होता है
बदहालो-बेचारा दिल बाद इसके कहीं रोता है

यूंही नही जहांमे तरन्नुम-ए-इश्क दोहराते परवाने
वो कौन है जो दिल में नगमा-ए-जफा लिए सोता है?

तबो-ताब गम-ए-सल्तनत की नसीब आती है
हां, यहीं हाल इक वफा-ए-पेशेदार का होता है

शायर कहलायेगा वो कारकून-ए-कचहरी जो
अपने खर्च-ए-एहसास से नगमे नही पिरोता है

चला चल आसमाँ की खाक-ए-इन्तेहा तक 'रोशन'
कहते है के कोई हबीब-ए-इनायत लिखा ही होता है

- संदीप भानुदास चांदणे (शुक्रवार, १४/१२/२०१८)

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