Saturday, August 22, 2020

जिंदगीसे जंग

रोज सवेरे जब उठ जाता हूं
जिंदगी के खिलाफ जंग के लिए
अपने आप को तैय्यार करता हूं
दिनभर के वार-पलटवारोंके बाद
जिंदगी फिर कल के लिए छोड देती है
तब, रात को एक नज्म लिखता हूं
जिंदगी को समझने और समझाने में
कुछ अलफाज खर्च कर देता हूं
अब तक, न तो जिंदगी समझ पायी है
न तो मैं अभी हारकर बैठा हूं!

- संदीप भानुदास चांदणे (मंगळवार, १८/८/२०२०)

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