Sunday, January 28, 2024

अब याद मुझे आती है वो

अब याद मुझे आती है वो
तेरी पनियाई आंखे हसती 
जब मैं अपनी पलके मुंदू
मुझसे आके बाते करती

गहरी कितनीही गहरी थी
तालाब हो एक जैसे बनमें
मैं डूबता अपनेकों पाऊ
जबभी देखू खुदको उनमें

जब उठ जाती वो मेरी तरफ
मीठीसी कसक एक आती थी
झुकती थी कुछ कहे बिना
तब, सांसे मेरी रूक जाती थी

समय ने ली दूजी करवट
अब सिर्फ बची यादे उनकी
तब लगता था मेरे दो जहाँ
देते थे अंदरसे झलकी

वो प्यार और सुकूं अब कहाँ?
वो कशीश उनसी अब कहाँ?
मैं बन गयां हूँ एक लुटा शहर
इसमें 'रोशन' रौनके अब कहाँ?

- संदीप चांदणे (सोमवार १६/११/२०)

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