Thursday, May 15, 2025

बे-मनू हूँ

काली रात के दामनसे लिपटा फिरू वो मजनू हूँ
झुलसकर खुद करू रोशन जंगल जंगल वो जुगनू हूँ

चल रहा चारों ओर इंतिहाई शोर-ओ-गुल मुसलसल
चलता रहे दुनिया-ए-तमाशा गाह में, मैं अपने में मगनू हूँ

रखी थीं एक बेवकूफी पास ज़माने दर ज़माने मैंने
अब आशना हूँ वक़ूफ़ी से अब जब मैं बे-मनू हूँ


- संदीप भानुदास चांदणे (गुरूवार, २९/०५/२०२५)

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