भिन्नभिन्न रंगोसे मलकर
पर अपने लहराते हो
काया अतिसुंदर है तुम्हारी
पक्षीकुमार कहलाते हो
कैसे न हो कोई विमुग्ध
छवि जैसी तुम पाये हो
हर्षभरित हो जाते जन
जब, नृत्यमुद्रा बनाते हो
सावन का मौसम जब आता
खिल खिल यौवन आते हो
नभ-धरती के मधुर मिलनसे
खुद रोमांचित हो जाते हो
प्रियतम अपनी को देखकर
वहीं रूप तुम धरते हो
जिसे देखने मन मानवका
लालायित तुम करते हो
यूँ तो सृष्टीमें अनेक खग
पर, चित्रोंमे सजते हो तुम
कान्हाकेभी साथ युगोंसे
ओ, मयूर हो रहते तुम!
- मुग्धा संदीप चांदणे (रविवार, २०/०४/२०२५)
मधुर शीळ मी वार्याची, पावसाची मी सन्ततधार, सडा पाडतो गीतांचा, मी शब्दांचा जादूगार....
Sunday, April 20, 2025
पक्षीकुमार
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
कही दूर जब दिन ढल जाये
उन एक पायरी अजून उतरून खाली आलं आणि झाडाच्या पदराखालून हळूच डोकावून बघू लागलं. कोरड्या फटफ्टीत रस्त्यावरून वाळक्या पालापाचोळ्यांचा घोळका गलक...
-
कहीं दूर तुम जंगल में रहते हो निबिड़ वनमें एक बार जो दृक हुए बस जाते हो फिर मनमें गाती बूँदे एक स्वर में झरझर चोटीसे झरती और सुनाती हैं सृष...
-
गारव्याची शाल मऊ अन स्वच्छ निरभ्र नभ निळे तृणपात्यांचा मऊ बिछाना रोज न असले सुख मिळे गंधाचा हलके शिडकावा ताटव्यातली करती कुसुमे मध्येच पिवळी...
-
सुनते थे हम, ये जिंदगी गम और खुशी का मेल है हमको मगर आया नजर ये जिंदगी वो खेल है कोई सब जीते, सब कोई हार दे अपनी तो हार है, यार मेरे, हां या...
No comments:
Post a Comment